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B Ed College Rajasthan
प्राकल्पना से मूर्तता की यात्रा
मेरी प्राकल्पना से मूर्तता की यात्रा का श्री गणेश झाड़ोल में २ जुलाई १९८१ में राजस्थान बाल कल्याण समिति की स्थापना एवं राजस्थान बाल विद्या मंदिर प्राथमिक विद्यालय के शुभारंभ के साथ प्रारंभ होकर २७ वर्षो पश्चात् भी पूर्णता एवं ठहराव के समीपस्थ नहीं है। जिस समय मैंने शिक्षा के माध्यम से सेवा की यात्रा प्रारंभ की उस समय झाड़ोल तहसील में अंध विश्वास, निर्धनता, स्वास्थ्य का निम्न स्तर, कुपोषण, शोषण जैसी अनेक समस्याओं से इस क्षेत्र के लोग अत्यधिक पीड़ित थे। क्षेत्रीय दुर्दशा को देखकर मेरे मन में यह दृढ़ धारणा बनती गई कि सभी समस्याओं का मूल कारण अशिक्षा हैं। अत: शिक्षा का निरन्तर प्रसार ही लोगों में विभिन्न समस्याओं के प्रति चेतना जागृत करने का एक सशक्त माध्यम होगा।
इस कल्पना को मूर्तरूप में परिणित करने के दृढ़ निश्चय के साथ १ जुलाई १९८१ को राजस्थान बाल विद्या मंदिर प्राथमिक विद्यालय प्रारंभ कर धीरे-धीरे प्राथमिक विद्यालय के बालक बालिकाओं की शैक्षणिक गुणवत्ता की वृद्धि को देखते हुए एवं उनमें छिपी प्रतिभाओं को ध्यान में रखकर प्राथमिक विद्यालय से उच्च प्राथमिक विद्यालय एवं सेकेण्ड्री विद्यालय के स्तर तक का विद्यालय बनाने की मन में लगन लगी। आदिवासी बालिकाओं की शिक्षा की गुणवत्ता में वृद्धि हेतु कन्या छात्रावास प्रारंभ किया गया।
वर्ष १९९८ में विद्यालय में सीनियर हायर सैकेण्ड्री स्तर पर विज्ञान संकाय प्रारम्भ किया गया ताकि यहां के बालक विज्ञान शिक्षा प्राप्त कर इसी क्षेत्र में डॉक्टर, इन्जिनियर, वैज्ञानिक एवं अच्छे शिक्षक बन, इस क्षेत्र की सेवा कर इसके चंहुमुखी विकास में अमूल्य योगदान दे।
वर्ष २००० में राजस्थान पब्लिक स्कूल (इंगलिश मिडीयम) का शुभारम्भ किया, ताकि बालक बचपन से ही हिन्दी के साथ-साथ इंगलिश को भी अच्छी तरह से पढ़, समझ एवं बोल सके। इसका प्रभाव अभी नहीं किन्तु बालकों के भविष्य में उच्च शिक्षा ग्रहण करने पर झलकने लगेगा।
छात्रों की उच्च शिक्षा की आकांक्षाओं की पूर्ति हेतु एवं उनके उज्ज्वल भविष्य के निर्माण हेतु झाड़ोल, गोगुन्दा, पिण्डवाडा, रेलमगरा, माउण्ट आबू, ऋषभदेव में स्नातक स्तर, झाडोल में बी.एड. एवं सागवाडा में नर्सिंग महाविद्यालय प्रारंभ कर आदिवासी निर्धन छात्र-छात्राओं को उच्च शिक्षा के अवसर प्रदान कर उनके सुनहरे भविष्य के निर्माण करने का भरसक प्रयास किया जा रहा है। यह सब समिति परिवार के सदस्यों की मेहनत, लगन व अथक प्रयासों का परिणाम है।
मेरी यह आकांक्षा है कि ग्रामीण क्षेत्र में एक जनजातीय विश्वविद्यालय की स्थापना की जाए। इस विश्वविद्यालय में सभी प्रकार की शिक्षा की समुचित व्यवस्था हो ताकि न केवल इस क्षेत्र के छात्र-छात्राऐं अपितु शहर के छात्र-छात्राओं को भी ऐसे विश्वविद्यालयों में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के अवसर उपलब्ध हो सके। आदिवासी समाज को मुख्य धारा से जोड़ने का यह एक उत्तम माध्यम साबित होगा।
व्यावसायिक शिक्षा केन्द्र तथा जनजाति विश्वविद्यालय की मेरी कल्पना को मूर्त रूप दिये जाने हेतु मुझे संस्था के कार्यकर्ताओं की मेहनत, लगन व कार्यक्षमता पर पूरा भरोसा है। वे मेरे अधूरे सपनों को पूरा कर मेरी कल्पना से मूर्तता की यात्रा को साकार रूप देकर इस क्षेत्र की सेवा में अमूल्य योगदान देंगे।
प्राकल्पना की मूर्तता की इस लम्बी यात्रा में ईश्वर ने मुझे शक्ति और संबल प्रदान कर मेरी प्राकल्पना को साकार करने में सहायता प्रदान की किन्तु पिछले कुछ वर्षों से पक्षाघात हो जाने के कारण मैं चिन्तित हूँ कि मेरी यह यात्रा अधूरी न रह जाए।
इसी भावना के साथ
(जीवतराम शर्मा)
संस्थापक

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